सत्य की प्यास – Satya Ki Pyas
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ध्यान साधना शिविर, जूनागढ़ में ध्यान-प्रयोगों एवं प्रश्नोत्तर सहित ओशो द्वारा दिए गए पांच अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन
विवरण
ध्यान साधना शिविर, जूनागढ़ में ध्यान-प्रयोगों एवं प्रश्नोत्तर सहित ओशो द्वारा दिए गए पांच अमृत प्रवचनों का अपूर्व संकलन
सत्य की प्यास – Satya Ki Pyas
कितनी आश्चर्य की बात है, भगवान का नाम है जो आप ले लेंगे? और भगवान का नाम आपको पता कैसे चल गया? किसने आपको बता दिया भगवान का नाम? भगवान का कोई नाम है या कि सब नाम हमने भगवान के कल्पित कर लिए हैं। और हमें भगवान का नाम भी पता है और अपना नाम पता भी नहीं होगा। अगर हम किसी से पूछें कि तुम्हें अपना पता है, तो उसे अपने नाम का भी पता नहीं होगा कि वह क्या है, कहां से है, कौन है। लेकिन हमें कहेंगे कि हमें भगवान का नाम पता है। और भगवान का कोई नाम हो सकता है? लेकिन हम भगवान का नाम आधा घंटा ले सकते हैं और इस भ्रम में रह सकते हैं कि हमने भगवान का स्मरण किया।
हमें जिन्हें अपना भी पता नहीं है उन्हें भगवान के नाम का पता है! और हम उसे ले लेंगे और दोहरा लेंगे आधा घंटा और एक तृप्ति की श्वास लेकर घर लौट जाएंगे कि हमने भगवान का नाम लिया! इससे बड़ी झूठ और कुछ भी नहीं हो सकती। इससे बड़ा असत्य और क्या हो सकता है। लेकिन हमें सीखनी है कुछ बातें, कुछ बातें हमें बता दी गई हैं कि यह भगवान का नाम है। और हमने इसे स्वीकार कर लिया है। और हमइस स्वीकृति को दोहराते हैं। और तब इसका एक ही परिणाम होता है वह यह कि भगवान को बिना जाने जानने का भ्रम पैदा हो जाता है। बिना जाने जानने का भ्रम पैदा हो जाता है। कहीं भी हमें कोई भीतर से संबंध भगवान से पैदा नहीं हो पाता, लेकिन कुछ शब्द, कुछ सिद्धांत, कुछ नाम, जो चारों तरफ हवा से हम सीख लेते हैं, उनसे हमें प्रतीत होता है हमने भगवान को जाना। मैं आपसे निवेदन करूं, इस भांति की जो आस्तिकता है सीखी हुई, भगवान तक पहुंचने में इससे बड़ी और कोई बाधा नहीं है, और बड़ा कोई हिंडरेंस नहीं है। इसलिए ये तथाकथित आस्तिक शायद ही कभी भगवान को जान पाता हो। शायद ही। क्योंकि खोजने के पहले उसने मान लिया, जानने के पहले उसने जान लिया, पहचानने के पहले उसने पहचान बना ली, जो कि बिलकुल झूठी होगी, जो कि बिलकुल असत्य होगी। और इस पहचान पर उसकी खोज चलेगी, इस पहचान पर उसका सारा ज्ञान निर्मित होगा, सारा जीवन निर्मित होगा। वह सारा जीवन मिथ्या हो जाएगा, झूठा हो जाएगा। क्योंकि उसका प्रारंभ ज्ञान से नहीं हुआ, अज्ञान को छिपाने से हुआ है। क्या यह उचित न होगा ईश्वर के खोजी को, परमात्मा की तलाश में गए हुए व्यक्ति को, या सत्य के अनुसंधान लगे हुए मनुष्य को, या जीवन के अर्थ को जो खोजने निकला है उसको, क्या सबसे पहले यह उचित न होगा कि वह यह जान ले कि वह कुछ भी नहीं जानता है? क्या यह प्राथमिक सीढ़ी न होगी कि वह अपने निपट और गहन अंधकार को और अज्ञान को स्वीकार कर ले? —ओशो
हमें जिन्हें अपना भी पता नहीं है उन्हें भगवान के नाम का पता है! और हम उसे ले लेंगे और दोहरा लेंगे आधा घंटा और एक तृप्ति की श्वास लेकर घर लौट जाएंगे कि हमने भगवान का नाम लिया! इससे बड़ी झूठ और कुछ भी नहीं हो सकती। इससे बड़ा असत्य और क्या हो सकता है। लेकिन हमें सीखनी है कुछ बातें, कुछ बातें हमें बता दी गई हैं कि यह भगवान का नाम है। और हमने इसे स्वीकार कर लिया है। और हमइस स्वीकृति को दोहराते हैं। और तब इसका एक ही परिणाम होता है वह यह कि भगवान को बिना जाने जानने का भ्रम पैदा हो जाता है। बिना जाने जानने का भ्रम पैदा हो जाता है। कहीं भी हमें कोई भीतर से संबंध भगवान से पैदा नहीं हो पाता, लेकिन कुछ शब्द, कुछ सिद्धांत, कुछ नाम, जो चारों तरफ हवा से हम सीख लेते हैं, उनसे हमें प्रतीत होता है हमने भगवान को जाना। मैं आपसे निवेदन करूं, इस भांति की जो आस्तिकता है सीखी हुई, भगवान तक पहुंचने में इससे बड़ी और कोई बाधा नहीं है, और बड़ा कोई हिंडरेंस नहीं है। इसलिए ये तथाकथित आस्तिक शायद ही कभी भगवान को जान पाता हो। शायद ही। क्योंकि खोजने के पहले उसने मान लिया, जानने के पहले उसने जान लिया, पहचानने के पहले उसने पहचान बना ली, जो कि बिलकुल झूठी होगी, जो कि बिलकुल असत्य होगी। और इस पहचान पर उसकी खोज चलेगी, इस पहचान पर उसका सारा ज्ञान निर्मित होगा, सारा जीवन निर्मित होगा। वह सारा जीवन मिथ्या हो जाएगा, झूठा हो जाएगा। क्योंकि उसका प्रारंभ ज्ञान से नहीं हुआ, अज्ञान को छिपाने से हुआ है। क्या यह उचित न होगा ईश्वर के खोजी को, परमात्मा की तलाश में गए हुए व्यक्ति को, या सत्य के अनुसंधान लगे हुए मनुष्य को, या जीवन के अर्थ को जो खोजने निकला है उसको, क्या सबसे पहले यह उचित न होगा कि वह यह जान ले कि वह कुछ भी नहीं जानता है? क्या यह प्राथमिक सीढ़ी न होगी कि वह अपने निपट और गहन अंधकार को और अज्ञान को स्वीकार कर ले? —ओशो
In this title, Osho talks on the following topics:प्रार्थना, समर्पण, जिज्ञासा, जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति, मनोविज्ञान, सौंदर्य, साक्षीभाव, उपनिषद
अधिक जानकारी
| Publisher | ओशो मीडिया इंटरनैशनल |
|---|---|
| ISBN-13 | 978-0-88050-984-8 |
| Number of Pages | 807 |
| File Size | 1.85 MB |
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