स्वर्णिम बचपन - Swarnim Bachpan

एक बुद्धपुरुष का विद्रोही बचपन
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एक सर्वकालिक पसंदीदा जिसमें ओशो अपने विद्रोही और शरारती बचपन को याद करते हैं। यह कहानियों और किस्सों की एक अद्भुत श्रृंखला है, जिसमें कलाकारों, संगीतकारों, जादूगरों और प्रबुद्ध व्यक्तियों की कहानियां शामिल हैं, जो बचपन में उनके मित्र बने थे।

विवरण

एक सर्वकालिक पसंदीदा जिसमें ओशो अपने विद्रोही और शरारती बचपन को याद करते हैं। यह कहानियों और किस्सों की एक अद्भुत श्रृंखला है, जिसमें कलाकारों, संगीतकारों, जादूगरों और प्रबुद्ध व्यक्तियों की कहानियां शामिल हैं, जो बचपन में उनके मित्र बने थे।


अंश:

"बहुत सुंदर सुबह है। सूरज रोज-रोज उगता है और वह सदा नया है। वह कभी पुराना होता ही नहीं। वैज्ञानिक कहते हैं कि वह लाखों साल पुराना है। व्यर्थ की बात है! मैं तो रोज उसे देखता हूं। वह हमेशा नया है। कुछ भी पुराना नहीं है। परंतु वैज्ञानिक तो गड़े मुर्दे उखाड़ने वाले होते हैं। इसीलिए मैं कहता हूं कि वे इतने गुरु-गंभीर दिखते हैं। आज सुबह, फिर से अस्तित्व का चमत्कार! वह तो हर क्षण हो रहा है किंतु बहुत ही कम लोग, बहुत ही कम लोग उसका साक्षात्कार कर पाते हैं।

‘साक्षात्कार’ शब्द बहुत सुंदर है। क्षण का साक्षात्कार--जैसा वह है! जैसा वह है वैसा ही उसे देखना--बिना कुछ जोड़े, बिना कुछ हटाए, बिना किसी संपादन के! ठीक जैसा है वैसा उसे देखना--एक दर्पण की भांति।...परमात्मा का शुक्र है कि दर्पण काट-छांट नहीं करता--नहीं तो संसार का कोई भी चेहरा उसे संतुष्ट नहीं कर सकता था, क्लियोपैट्रा का चेहरा भी नहीं! कोई भी चेहरा दर्पण में ठीक न बैठता, क्योंकि अगर वह तुम्हारी काट-छांट और जोड़-तोड़ करने लगता तो वह तुम्हें नष्ट कर देता। परंतु कोई भी दर्पण काट-छांट नहीं करता। खराब से खराब दर्पण भी बहुत सुंदर होता है, क्योंकि वह कोई काट-छांट नहीं करता। वह केवल प्रतिबिंबित करता है।

तुम्हारे ‘नोआ़ज आर्क’ में आने से पहले मैं खड़े होकर सूर्योदय को देख रहा था...आज वह कितना सुंदर है! और कल की चिंता किसको है? कल कभी आता नहीं। जीसस कहते हैं: ‘कल के बारे में मत सोचो...’"
ओशो

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Type फुल सीरीज
Publisher Osho Media International
Number of Pages 594
File Size 1.5 MB
ASIN B09MN6DR3S