एक नया द्वार – Ek Naya Dwar
विवरण
जागरूक रहें सारी आवाजों के प्रति एक साथ, किसी को चुनें नहीं कि मैं इसी आवाज पर मन को लगाऊंगा और उस आवाज को नहीं सुनूंगा। जो हो रहा है जिंदगी में प्रतिक्षण, मोमेंट टु मोमेंट जो हो रहा है, उसके प्रति पूरी तरह होश से भरे रहें। न तो किसी को हटाएं और न किसी को बुलाएं। बाहर के जगत के प्रति भी यही, और मन में भी जो चलता हो, कोई विचार चलते हों, उन विचारों में से भी छांटे न, कि यह अच्छा विचार है इसको मैं रोकूंगा और यह बुरा विचार है इसे मैं हटाऊंगा। जिसने बुरे विचार को हटाया, उसकी जिंदगी मुश्किल में पड़ जाएगी। बुरा विचार उसे लौट-लौट कर आने लगेगा। साधु-संन्यासी और सज्जन इतने परेशान रहते हैं कि जिसका कोई हिसाब नहीं है। बुरे विचारों को जितना हटाते हैं, पाते हैं कि बुरे विचार उतने ही चले आ रहे हैं। रोग की तरह बुरे विचार पकड़ लेते हैं हटाने वाले को। और अच्छे विचार को जितना पकड़ता है, लगता है कि वह खिसक-खिसक जाता है, हाथ से निकल-निकल जाता है, जैसे कोई पानी पर मुट्ठी बांधता हो।
अच्छे और बुरे विचार के बीच कोई चुनाव न करें। बुरे विचार के प्रति भी जागे रहें और अच्छे विचार के प्रति भी जागे रहें। ध्यान रखें जागे हुए होने का कि मैं होश से भरा रहूं भीतर। मेरे चित्त में कोई भी चीज बेहोशी में न निकलने पाए। कोई भी आए, मैं जाग कर उसे देखूं। जैसे कोई घर पर अपने पहरेदार बिठा देता है, वह पहरेदार देखता रहता है कि कौन गया, कौन आया। ऐसे अपने चित्त को पहरेदार बनाएं, एक वाचमैन बनाएं। और जैसे-जैसे चित्त इस पहरेदारी में समर्थ होता जाएगा, आप हैरान हो जाएंगे, न तो अच्छे विचार आएंगे और न बुरे विचार आएंगे। दोनों विदा हो जाएंगे। क्योंकि बुरे विचार इसलिए आते थे कि आप उनको हटाते थे। अच्छे विचार इसलिए नहीं रुकते थे कि उनको आप रोकते थे। लेकिन जब आपने दोनों बातें छोड़ दीं और मन के प्रति कोई भी भाव न रखा अच्छे और बुरे का, सिर्फ साक्षी रह गए, सिर्फ विटनेस रह गए, तो उनके आने और ठहरने का कोई कारण न रह गया। वे अपने आप विदा हो जाएंगे। और तब जो चित्त की स्थिति बनेगी, वही धार्मिक चित्त है, वही जागा हुआ चित्त है।
ओशोइस पुस्तक में ओशो निम्नलिखित विषयों पर बोले हैं:
विचार, ज्ञान, विश्वास, धारणाएं, सरलता, पक्षपात, निरीक्षण, सजगता, स्वतंत्रता, क्रांति
अधिक जानकारी
| Type | फुल सीरीज |
|---|---|
| Publisher | ओशो मीडिया इंटरनैशनल |
| ISBN-13 | 978-0-88050-852-0 |
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